सुन्नी वक्फ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान, बाबरी मस्जिद के बारे में किया ये खुलासा

अयोध्या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 23वें दिन सुनवाई की। मुस्लिम पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने बहस की शुरुआत की है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से उन्होंने बाबरी मस्जिद को लेकर बड़ी बात कही है। जिलानी ने एक गवाह के बारे में बताते हुए कहा कि 1954 में बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ने की कोशिश करने पर उस व्यक्ति को जेल हो गई थी। जिलानी ने हाजी महबूब के बयान का हवाला देते हुए कहा कि 22 नवंबर 1949 को हाजी महबूब ने बाबरी मस्जिद में नमाज अदा की थी। जफरयाब जिलानी ने मोहम्मद हाशिम के बयान का हवाला देते हुए कहा कि हाशिम ने कहा था कि उन्होंने 22 दिसबंर 1949 को बाबरी मस्जिद में नमाज पढ़ी थी।

बाबरी मस्जिद में तीन स्थानों पर अल्लाह लिखे जाने की कही गई बात.

जफरयार जिलानी ने कहा कि वह पर रोज नमाज पढ़ने के लिए जानेमाज और चटाई रखी रहती थी। अयोध्या में सिर्फ दो मस्जिद ऐसी थी जहां पर नमाज पढ़ी जाती थी, जिनमें से बाबरी मस्जिद एक थी। जिलानी ने कहा कि 5 वक़्त की नमाज व अजान देने के लिए पेशमाम की नियुक्ति की जाती थी, जिनको उस समय 5 रुपए महीना सैलरी दी जाती थी, इससे साबित होता है कि वहां पर मस्जिद थी। जिलानी ने कहा कि मस्जिद में तीन जगहों पर अल्लाह लिखा हुआ था। 1934 में मस्जिद के विध्वंस के बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर उसको 1935 में दोबारा लिखा गया। 1934 से 1949 के बीच एक भी ऐसा दस्तावेज नहीं है, जो यह साबित करता हो वह जगह मस्जिद नहीं, बल्कि मंदिर के तौर पर इस्तेमाल की गई हो।

जफरयाब जिलानी ने 1942 के एक केस का जिक्र करते हुए कहा कि विवादित जमीन की पहचान मस्जिद के रूप में ही हुई थी। मुसलमानों को इमारत के अंदर जाने की इजाजत दी गयी थी। ये नहीं कहा जा सकता कि इमारत को मस्जिद के अलावा किसी और मकसद के लिए इस्तेमाल किया जाता था। जिलानी ने कहा कि राजीव धवन ने जो भी बाहरी अहाते के बारे में कहा, उसमें कोई विवाद नही होना चाहिए। राजीव धवन ने कहा था कि निर्मोही अखाड़ा विवादित जमीन के बाहरी अहाते में पूजा करता था। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने कहा कि मस्जिद की एक बाद सफाई हो जाए तो वहां दुबारा नमाज पढ़ी जा सकती है। 1943 अयोध्या में हुए दंगे के कुछ महीने बाद मस्जिद में दोबारा नमाज पढ़ने की इजाजत दे दी गई थी। यह नही कहा कि सकता है वहां पर नमाज नहीं पढ़ी गई।

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