अब लखनऊ की पहचान पर लगेगा ब्रेक,1983 में हर खिलाड़ी को मिला था ये स्कूटर भेंट

राजधानी की पहचान इतिहास बनने के कगार पर है। देश को लम्ब्रेटा, विजय डीलक्स और विजय सुपर जैसे स्कूटर देने वाली कंपनी स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड  को केंद्र सरकार ने एक बार फिर बंद करने का फैसला लिया है। इसके लिए 20 दिन का वक्त तय किया गया है।
राजधानी की पहचान इतिहास बनने के कगार पर है। देश को लम्ब्रेटा, विजय डीलक्स और विजय सुपर जैसे स्कूटर देने वाली कंपनी स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड  को केंद्र सरकार ने एक बार फिर बंद करने का फैसला लिया है। इसके लिए 20 दिन का वक्त तय किया गया है। इस फैसले से सैकड़ों कर्मियों के भविष्य पर संकट खड़ा है और वे विरोध में उतर आए हैं। बैलगाड़ी के दौर में देश को दोपहिया वाहनों पर दौड़ाने वाला स्कूटर का ब्रांड देसी वक्त के आगे हार गया। स्कूटर इंडिया की आर्थिक स्थिति काफी समय से खराब थी। इसके स्कूटर तेजी से बदलते मार्केट में खुद को ढाल नहीं पाए । आखिरी बार 1980 में लंब्रेटा बाजार में आया और फिर विक्रम नाम से प्रोडक्शन शुरू किया मगर कुछ वर्षो से वह भी बंद हो गया। 28 नवंबर 2019 को दिल्ली में बैठक हुई थी, जिसमें फैसले पर मुहर लगी। उसी कड़ी में 28 जनवरी को मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी ने चेयरमैन आर. श्रीनिवास को पत्र भेजा है। साफ लिखा है कि कंपनी को बंद करने की प्रक्रिया 20 दिन में पूरी हो और रिपोर्ट सरकार को भेजें।
1983 में मिला एक-एक को स्कूटर स्कूटर इंडिया का रोचक और स्वर्णिम सफर देश की आन-बान और शान माना जाता था। इसलिए क्योंकि बैलगाड़ी वाले देश में यह इकलौती देसी ऑटोमोबाइल कंपनी जो थी। 80 के दशक में इसकी  अपनी शान थी। हर जुबां पर इसके ब्रांड छाए थे। एक समय ऐसा भी आया, जब एक साल में कंपनी ने 35 हजार से ज्यादा विजय डीलक्स और विजय सुपर स्कूटर तैयार कर डाले। विजय डीलक्स का तो बाजार पर एकछत्र राज था। देसी ब्रांड की साख का अंदाजा इसी से लगा सकते है 1983 में जब कपिल देव की कप्तानी में भारतीय क्रिकेट टीम ने पहली बार विश्व कप जीता तो तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने सभी खिलाडिय़ों को एक-एक विजय डीलक्स स्कूटर भेंट किया। खिलाडिय़ों के बीच यह ब्रांड खासे लोकप्रिय थे। आमजन ही नहीं, फिल्मी पर्दे पर भी स्कूटर इंडिया के ब्रांड का दबदबा था। देश ही नहीं, स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड कंपनी के लम्ब्रेटा, विजय डीलक्स, सुपर स्कूटर ने दुनिया भर में कामयाबी के झंडे गाड़े। लम्ब्रेटा की खासियत थी कि  ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर भी अपने सवार को लडख़ड़ाने नहीं देता था।
स्कूटर इंडिया  का सफर स्कूटर इंडिया के जरिये पहला देसी दोपहिया का किस्सा भी दिलचस्प है। 1972 में नवाबों के शहर लखनऊ पहुंची थी कंपनी। इससे पहले लोग इसे इन्नोसेंटी के नाम से जानते थे। यह पहले इटली के खूबसूरत शहर मिलान के नजदीक लैम्ब्रो नदी के पास लैम्ब्रेट में थी। फर्डिनेंडो इन्नोसेंटी के प्रयासों से 1922 में यह वजूद में आई। उन्होंने ही नाम दिया गया इन्नोसेंटी। मेरा प्रॉडक्ट लम्ब्रेटा दुनियाभर में मशहूर हुआ था।  आजादी के बाद भारत में निजी वाहनों का चलन बढऩे लगा। हालांकि, आम लोगों के पास इतना पैसा नहीं था कि वह छोटी कार भी आसानी से खरीद सकें। उनकी यह हसरत लम्ब्रेटा स्कूटर ने पूरी की। देखते ही देखते भारत में लम्ब्रेटा स्कूटर इंडिया मध्यवर्ग के घर-घर की पहचान बन गया। यही वजह रही कि सत्तर के दशक में जब इटली में घरेलू सहायकों (कर्मचारियों) ने आंदोलन शुरू किया और आर्थिक तंगी का दौर शुरू हुआ तो भारतीयों ने स्कूटर इंडिया के प्रति खास दिलचस्पी दिखाई। 1971 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से स्कूटर इंडिया लखनऊ में नया नाम देकर बसाने की सिफारिश की। साल भर बाद यानी 1972 में भारत ने इटली से प्लांट व मशीनरी, डाक्यूमेंट और ट्रेडमार्क खरीद लिए गए। इसी के साथ उदय हुआ देसी ब्रांड स्कूटर्स इंडिया लिमिटेड।
टू व्हीलर से थ्री व्हीलर का सफर स्कूटर्स इंडिया के सेवानिवृत्त कर्मचारी कहते हैं कि साल 1995 के दौरान टू व्हीलर के गिरते क्रेज व बाइक का बढ़ता ट्रेंड स्कूटर्स इंडिया के लिए चुनौती बन गया। कंपनी व वर्कर्स की सहमति से थ्री व्हीलर वाहन की शुरुआत पर मुहर लगी। अपग्रेडेशन के तहत कंपनी को कई थ्री-व्हीलर प्रोजेक्ट मिले। यही कारण रहा कि टू व्हीलर के बाद थ्री व्हीलर में भी स्कूटर्स इंडिया अन्य कंपनियों को मात देती रही।