अयोध्या: सुप्रीम कोर्ट के आज के फ़ैसले के बाद भी बचे रहेंगे 2 कानूनी विकल्प

न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अंतिम होता है। उसे किसी और अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।लेकिन, अंतिम फ़ैसले के बाद भी पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। फैसला आने के 30 दिन के भीतर यह दाखिल की जा सकती है।

असंतुष्ट पक्ष के पास दो क़ानूनी विकल्प होंगे

अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट 40 दिनों की नियमित सुनवाई के बाद शनिवार (नवम्बर 9, 2019) को सुबह 10.30 बजे फ़ैसला सुनाएगी। इस मामले में सीजेआई रंजन गोगोई, भावी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोड़बे, जस्टिस अब्दुल नज़ीर जस्टिस वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण ने सुनवाई की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 16 अक्टूबर को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। पूरे देश में कई हिस्सों में स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। सुरक्षा की दृष्टि से अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए हैं और सोशल मीडिया पर नज़र रखी जा रही है। ऐसे में सवाल का उठना लाजिमी है कि फ़ैसला आने के बाद दोनों पक्षों के पास क्या क़ानूनी विकल्प रहेगा?

न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अंतिम होता है। उसे किसी और अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।लेकिन, अंतिम फ़ैसले के बाद भी पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। फैसला आने के 30 दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। पुनर्विचार याचिका में असंतुष्ट पक्ष यह साबित करने की कोशिश करता है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में त्रुटि है।

अमूमन इस तरह की याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई नहीं होती। मुक़दमे और फाइलों के रिकॉर्ड के आधार पर सुनवाई की जाती है। आपको याद होगा कि सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी कई पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की गई थीं। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान सामान्यतः वकीलों की दलीलें नहीं होतीं। जज चैंबर में सर्कुलेशन के जरिए सुनवाई कर सकते हैं।

असंतुष्ट पक्ष के पास दूसरा विकल्प क्यूरेटिव याचिका दाखिल करने का होगा। इसे उपचार याचिका भी कहा जाता है। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद भी असंतुष्ट पक्ष के पास क्यूरेटिव याचिका दायर करने का विकल्प खुला रहता है। इसमें फ़ैसले में उन मुद्दों पर चर्चा करने को कहा जाता है, जहाँ ऐसा लगता है कि ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इसके लिए भी 30 दिनों की समयसीमा तय की गई है। पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के 30 दिनों के भीतर क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है। इसके बाद जो भी फ़ैसला आता है, वह सर्वमान्य हो जाता है।

अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद असंतुष्ट पक्ष इन दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करता है या नहीं। फ़िलहाल फ़ैसले को लेकर सभी की नज़रें सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय बेंच पर टिकी है। ख़ुद सीजेआई ने यूपी के उच्चाधिकारियों को तलब कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया है।