किसान आंदोलनः राष्ट्रीय जांच एजेंसी के समन के बाद बदले हालात

विज्ञापनदेश की सबसे बड़ी अदालत में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दायर याचिका पर बहस के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने एक बड़ी बात कही थी. उन्होंने कहा था कि किसान आंदोलन में खालिस्तान समर्थकों ने ना सिर्फ घुसपैठ कर ली है, बल्कि इस आंदोलन की परोक्ष फंडिंग भी कर रहे हैं. तब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को इस बारे में हलफनामा दायर करने को कहा था. आंदोलनकारियों में देश विरोधी ताकतों की घुसपैठ के आरोपों को किसान संगठन ना सिर्फ खारिज करते रहे हैं, बल्कि इसके लिए वे अपने आंदोलन को बदनाम करने की मोदी सरकार की कोशिश का आरोप भी लगाते रहे हैं. इस बीच राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने किसान आंदोलनकारी नेताओं और उनके समर्थकों सहित सौ से ज्यादा लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के सूत्रों के हवाले से जो खबरें समाचार माध्यमों में आई हैं, उसका संदेश स्पष्ट है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के हाथ कुछ सूत्र लगे हैं, जिनसे पता चलता है कि किसान संगठनों के आंदोलन को परोक्ष तरीके से कनाडा और ब्रिटेन में बसे खालिस्तान समर्थक समूहों से आर्थिक मदद मिली है.

हालांकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी की नोटिस की टाइमिंग ने किसान आंदोलनकारियों को सवाल उठाने का मौका दे दिया है. कृषि कानूनों पर सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई सोमवार 18 जनवरी को होनी है. इसके ठीक एक दिन पहले पूछताछ और गवाही के लिए आंदोलनकारियों को बुलाना जांच एजेंसी पर सवाल उठाने का मौका भी देता है. आंदोलनकारियों का आरोप है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने ऐसा इसलिए किया, ताकि उनसे पूछताछ और गवाही के आधार पर सरकार अपने कहे को सच साबित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर सके.

आंदोलनकारियों के आरोप में कितना दम है, यह तो सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल होने वाले हलफनामे के बाद पता चलेगा. लेकिन यह सच है कि इस सिलसिले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 15 दिसंबर 2020 को गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम समेत कई धाराओं में मामला दर्ज किया था. जाहिर है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पुख्ता सबूत मिलने के बाद ही लोगों को पूछताछ के लिए बुलाया है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे लोकभलाई इंसाफ वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष और किसान नेता बलदेव सिंह सिरसा को 17 जनवरी को पूछताछ के लिए बुलाया है. हालांकि उन्होंने अपने घर में शादी होने के नाम पर एजेंसी के सामने पेश होने से मना कर दिया है. एजेंसी ने किसान आंदोलनकारी सुरेंद्र सिंह, पलविंदर सिंह, प्रदीप सिंह, नोबेलजीत सिंह और करनैल सिंह के साथ ही पंजाबी अभिनेता नवदीप संधू और एक पत्रकार को भी बुलाया है.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जो मामला दर्ज किया है, उसमें कहा गया है कि खालिस्तान के समर्थन के लिए अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी समेत कई देशों में जमीनी स्तर पर अभियान और प्रचार बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में धन जुटाया जा रहा है. एजेंसी के आरोप के मुताबिक, इन अभियानों को कुख्यात खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू, परमजीत सिंह पम्मा, हरदीप सिंह निज्जर आदि चला रहे हैं. जांच एजेंसी के मुताबिक इसमें सिख फॉर जस्टिस समेत कई खालिस्तानी समर्थक संगठन सोशल मीडिया समेत कई मंचों पर तेज अभियान चला रहे हैं. उनका मकसद देश को तोड़ना है. हालांकि आंदोलनकारी इन सब आरोपों से इनकार कर रहे हैं.

आंदोलनकारी लाख इनकार करें, लेकिन जिस तरह दिल्ली के धरना स्थलों पर कुछ दिनों पहले देशविरोधी संदिग्धों के साथ दिल्ली दंगों के आरोपियों की रिहाई की मांग वाले पोस्टर लेकर प्रदर्शन किए, उससे यह शक तो बढ़ता ही है कि आंदोलन की आड़ में कुछ देशविरोधी तत्व भी सक्रिय हैं. लगता है कि इसका आभास किसान नेताओं तक को हो गया है, तभी भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत को अपील करनी पड़ी कि सरकार ऐसे लोगों की पहचान करे और उन्हें सार्वजनिक तौर पर फांसी पर लटका दे. उन्हें विरोध नहीं होगा.

एक खास विचारधारा ने भले ही बराबरी के विचार के नाम पर भारतीयता और राष्ट्र की अवधारणा को किनारे लगाने में भरपूर कोशिश की है. इसके बावजूद देश का सामान्य नागरिक कम से कम अब भी एक मुद्दे पर किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं होता. वह मुद्दा है, राष्ट्र की अखंडता और उसकी सीमाओं की सुरक्षा. देश के बंटवारे का विचार भी आम भारतीय को आक्रामक बना देता है. इसीलिए कोई भी पार्टी, समुदाय या संगठन राष्ट्र की अस्मिता पर उठने वाली आवाजों से खुद को किनारा कर लेता है. आम भारतीय किसी भी कीमत पर राष्ट्र का विखंडन स्वीकार नहीं कर सकता. ऐसे विचारों का समर्थन करने वालों की साख उसकी नजर में गिरते देर नहीं लगती. यह बात किसान आंदोलनकारी जानते हैं. इसीलिए इस विचार और आरोप से किनारा कर रहे हैं.

बहरहाल अगर राष्ट्रीय जांच एजेंसी के हाथ एक भी पुख्ता सुराग लगा तो तय मानिए, किसान आंदोलन को साखहीन होने से कोई नहीं रोक सकेगा. किसान आंदोलन में एक धड़े ने जिस तरह घटिया आक्रमण किए हैं, इंदिरा की तरह मोदी को सिखाने की धमकियां दी हैं, उससे भी लगने लगा था कि यह आंदोलन महज न्यूनतम समर्थन मूल्य का नहीं, बल्कि इससे आगे का है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी के आरोपों से लगने लगा है कि आंदोलन के पीछे राष्ट्र की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाली नापाक शक्तियां भी हैं.

अगर एक बार यह धारणा आम लोगों में फैल गई तो भारत के नगर समाज के सामने भद्र और भोला समझा जाना वाला किसान समुदाय भी अपनी साख खो देगा. ऐसे में जरूरी है कि किसान संगठन अपनी वाजिब मांगों को लेकर वाजिब ढंग से सामने आएं. अन्यथा एक बार साख गई तो उनका कथित नेतृत्व अपनी स्वार्थी रोटी सेंककर आगे बढ़ जाएगा और वे खाली हाथ रह जाएंगे.

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय. देश के तकरीबन सभी पत्र पत्रिकाओं में लिखने वाले उमेश चतुर्वेदी इस समय आकाशवाणी से जुड़े है. भोजपुरी में उमेश जी के काम को देखते हुए उन्हें भोजपुरी साहित्य सम्मेलन ने भी सम्मानित किया है.