किसी की सज़ा का सिर्फ़ निलंबन या उसे ज़मानत देने का मतलब यह नहीं कि उसकी सज़ा माफ़ हो गई है, पढ़िए दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिर कहा है कि किसी की सज़ा को अपील पर सुनवाई तक निलंबित करने का मतलब यह नहीं है कि उसको मिली सज़ा अब जारी नहीं रहेगी। न्यायमूर्ति रेखा पाटिल ने कहा कि आपराधिक मामलों के लिए अदालती कार्रवाई झेल रहे किसी अपराधी को ज़मानत मिल जाती है या उसकी अपील पर सुनवाई होने तक उसकी सज़ा को निलंबित कर दिया जाता है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसकी सज़ा ख़त्म हो गई।

वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता को आईपीसी के धारा 363, 366, 368 और 376 के तहत सज़ा दी गई पर उसकी अपील पर अपीलीय अदालत ने उसकी सज़ा को निलंबित कर दिया और उसकी अपील पर सुनवाई होने तक उसे ज़मानत दे दी। अपीलकर्ता को सेवा से निकाला इस बीच, दिल्ली जल बोर्ड ने अपीलकर्ता को उसकी सेवा से निकाल दिया। अपनी सेवा बर्ख़ास्तगी से दुखी इस व्यक्ति ने औद्योगिक विवाद के तहत वाद दाख़िल किया जिसे श्रम अदालत ने ख़ारिज कर दिया जब उसको पता चला कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने सभी मामलों पर ग़ौर करने के बाद उसको दोषी पाया।

इसके बाद उसने ये रिट दर्ज किया है। याचिकाकर्ता के वक़ील ने कहा कि इसके बावजूद कि याचिकाकर्ता की अपील अभी भी हाईकोर्ट के समक्ष लंबित है, एक बार जब उसकी सज़ा को निलंबित कर दिया गया है और उसे ज़मानत पर रिहा किया जा चुका है। प्रतिवादी उसे सेवा में दोबारा बहाल करने के लिए बाध्य है, क्योंकि सज़ा का यह निलंबन दंडित करने के आदेश की तरह होगा और इसका अर्थ यह हुआ कि सज़ा का अस्तित्व अब नहीं है।

प्रतिवादी के तर्क प्रतिवादी की पैरवी करते हुए उनके वक़ील रमीज़ुद्दीन राजा ने कहा कि तय स्थिति के अनुसार सिर्फ़ किसी की सज़ा को निलंबित कर दिए जाने से उसकी सज़ा समाप्त नहीं हो जाती है और नियोक्ता इस तरह की सज़ा के तथ्यों और प्रभावों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकता।

अदालत ने याचिकाकर्ता के दावे को ख़ारिज कर दिया और इसके लिए भारत संघ एवं अन्य बनाम रमेश कुमार AIR 1997 SC ३५३१ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि – “अगर अनुशासनात्मक अथॉरिटी इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि जिस अपराध के लिए किसी सरकारी अधिकारी को सज़ा मिली है, वह ऐसा है कि उसको सेवा में रखना प्रथम दृष्ट्या अवांछनीय है तो वह उसके ख़िलाफ़ सीसीएस के नियम 19(1) (सीसीए) नियम, 1965 के तहत उसे नौकरी से हटा सकता है या उसकी सेवा बर्खास्त कर सकता है…।” अदालत ने रिट याचिका को अस्वीकार करते हुए कहा कि दिल्ली जल बोर्ड का यह निष्कर्ष उचित था कि याचिकाकर्ता को नौकरी में बनाए रखना अवांछनीय है। याचिकाकर्ता को अदालत ने ₹10000 मुक़दमे की लागत के रूप में जमा कराने को भी कहा।