क्या है योगी सरकार की संविदा पर भर्ती का फॉर्मूला, जिस पर बवाल मचा है

क्या है योगी सरकार की संविदा पर भर्ती का फॉर्मूला, जिस पर बवाल मचा है
योगी सरकार के संविदा प्रस्ताव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे NSUI कार्यकर्ताओं को रोकती पुलिस

पुलिस भर्ती. शिक्षक भर्ती. लेखपाल-पटवारी भर्ती. सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले लाखों लोग इन भर्तियों का इंतजार करते हैं. सालों-साल तैयारी करते हैं. परीक्षा देते हैं. फिर कभी रिजल्ट के लिए आंदोलन करते हैं, तो कभी भर्ती में धांधली के खिलाफ सरकार की नाक में दम कर देते हैं. कोर्ट-कचहरी धरना प्रदर्शन सब करते हैं और फिर नौकरी लेते हैं. इन सबसे जिसकी फजीहत होती है, वो है सरकार. भर्ती नहीं हो रही है, तो सरकार जिम्मेदार. और होती है, तो फिर भर्ती आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सरकार को दौड़-भाग करना पड़ जाता है. ऐसे में यूपी की योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ऐसा प्रस्ताव लाने जा रही है, जिससे ये सारी झंझट ही खत्म हो जाएगी

सरकारी नौकरी की पंचवर्षीय योजना

 नए प्रस्ताव के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में ग्रुप बी और सी की नौकरियों के लिए अब संविदा पर भर्ती की जाएगी. यानी कि पहले भर्ती निकाली जाएगी. लोगों का सेलेक्शन होगा. फिर पांच साल के कॉन्ट्रैक्ट पर काम कराया जाएगा. इन पांच साल में हर छह महीने पर एक टेस्ट लिया जाएगा, जिसमें कम से कम 60 फीसद अंक पाना अनिवार्य होगा. दो छमाही में इससे कम अंक लाने वाले लोगों को सेवा से बाहर कर दिया जाएगा. पांच साल की संविदा के दौरान किए गए काम को Measurable Key Performance Indicator यानी  MKPI के पैमाने पर मापा जाएगा. सरकार MKPI फॉर्मूला भी तय कर रही है.

पांचवें साल छह महीने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी. इसके अलावा संविदा पर नियुक्ति के दौरान मूल पदनाम के बजाय सहायक पदनाम दिया जाएगा. जैसे  शिक्षक के लिए सहायक शिक्षक. संविदा पर नियुक्ति के दौरान यूपी सरकारी सेवक अनुशासन एवं अपील नियमावली 1999 भी लागू नहीं होगी. इस दौरान किसी भी तरह का सर्विस बेनिफिट नहीं दिया जाएगा. जो लोग 5 साल की संविदा नियुक्ति पूरी कर लेंगे, फिर उन्हें परमानेंट कर दिया जाएगा. नई व्यवस्था को लागू करने के पीछे सरकार का तर्क ये है कि इससे कर्मचारियों की कार्य-क्षमता बढ़ेगी और सरकार पर आर्थिक बोझ भी कम होगा.

अभी क्या व्यवस्था है

अभी अलग-अलग संवर्ग की सेवा नियमावली के अनुसार सेलेक्ट हुए लोग एक से दो साल के प्रोबेशन पर सीनियर अधिकारियों के निगरानी में काम करते हैं. इस दौरान उन्हें वेतन और दूसरे सभी सर्विस बेनिफिट दिए जाते हैं. प्रोबेशन पूरा होने पर इन कर्मचारियों को नियमित कर दिया जाता है. 1 अप्रैल 2019 को उत्तर प्रदेश में ग्रुब बी के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों की संख्या 58,859 जबकि ग्रुप सी के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों की संख्या 8 लाख 17 हजार 613 बताई गई थी

विपक्ष ने सरकार पर बोला हमला

उत्तर प्रदेश सरकार के इस प्रस्ताव का विपक्षी दलों ने जमकर विरोध किया है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे सरकारी नौकरियों में ठेका प्रथा की शुरुआत बताया. उन्होंने कहा-

युवाओं के प्रति तो भाजपा का रवैया शुरू से ही संवेदना शून्य रहा है. भाजपा की गलत नीतियों के चलते प्रदेश पिछड़ता ही जा रहा है. परेशान हाल नौजवान आत्महत्या कर रहे हैं. समूह ख व ग की भर्ती प्रक्रिया में बदलाव किया जा रहा है, जिससे सरकारी नौकरियों में भी ठेका प्रथा लागू हो जाएगी.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी सरकार दे इस प्रस्ताव की जोरदार मुखालफत की है. उन्होंने कहा-

 युवा नौकरी की मांग करते हैं और यूपी सरकार भर्तियों को 5 साल के लिए संविदा पर रखने का प्रस्ताव ला देती है. ये जले पर नमक छिड़ककर युवाओं को चुनौती दी जा रही है. गुजरात में यही फिक्स पे सिस्टम है. वर्षों सैलरी नहीं बढ़ती, परमानेंट नहीं करते. युवाओं का आत्मसम्मान नहीं छीनने देंगे.

गुजरात में क्या सिस्टम है

गुजरात में इसे ‘फिक्स पे सिस्टम’ कहा जाता है. यानी कि संविदा पर रखे गए कर्मचारियों को मिलने वाली तनख्वाह फिक्स रहती है. पांच साल या जितने भी समय के लिए कॉन्ट्रैक्ट होता है, उसी तनख्वाह पर काम करना होता है. इसकी शुरुआत हुई 1996 में. तब बालगुरु योजना के अंतर्गत प्राथमिक शिक्षकों को मिलने वाला वेतन फिक्स किया गया. 2006 में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी फिक्स पे नीति लेकर आए. इसके अंतर्गत सिपाही, सब-इंस्पेक्टर, पटवारी, शिक्षक जैसे पदों के लिए फिक्स पे व्यवस्था कर दी गई. ज्यादातर पदों के लिए 2500 रुपए हर महीने और बाकी के लिए 4500 रुपए प्रति महीने. पांच साल तक इसी तनख्वाह पर लोग काम करते रहे. इस दौरान न तो उन्हें कोई सरकारी लाभ मिलता है और न ही उनकी सीनियरिटी गिनी जाती है. 2011 में गुजरात हाईकोर्ट ने इस फिक्स पे सिस्टम को रद्द कर दिया. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ये सिस्टम न्यूनतम तनख्वाह के नियम का उल्लंघन करती है. हाईकोर्ट ने कर्मचारियों को समान वेतन देने का आदेश दिया

युवाओं में गुस्सा 

हमारे आस-पास ऐसे छात्रों-युवाओं की एक बड़ी आबादी है, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी करती है. सालों-साल लगे रहते हैं, शिक्षक भर्ती से लेकर पुलिस और दूसरी अन्य भर्तियों की तैयारी करते हैं. भर्तियां आती हैं और लटक जाती हैं. हाल के दिनों में बेरोजगारी और लटकी हुई भर्तियों को पूरा कराने की मांगों को लेकर सोशल मीडिया पर माहौल खूब गर्म रहा. इलाहाबाद जैसे शहर, जो प्रतियोगी छात्रों के हब कहे जाते हैं, वहां सड़कों पर भी खूब प्रदर्शन हुए हैं. तीन-तीन, चार-चार साल से भर्तियां लटकी पड़ी हैं. सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन भर्तियां लटकी रह जाती हैं

यूपी की बात करें, तो 2016 की 12,460 शिक्षक भर्ती, 2016 की ही 32 हजार बीपीएड शिक्षक भर्ती, 2018 की  69 हजार शिक्षक भर्ती,  2018 की 41520 सिपाही भर्ती जैसी तमाम भर्तियां हैं, जो कोर्ट में फंसी हुई हैं. कोरोना काल के दौरान इन भर्तियों में फंसे अभ्यर्थियों का गुस्सा सोशल मीडिया पर जमकर देखने को मिला है. और इसी बीच में सरकार ऐसा प्रस्ताव लेकर आ जाती है, जिसमें सरकारी नौकरी की उम्मीद ही लगभग खत्म हो जाती है. सरकार के इस फैसले के खिलाफ यूपी के अलग-अलग शहरों में जमकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. आने वाले दिनों में ये और भी तेज हो सकते  हैं.