तांगा चलाने वाला कैसे बना अरबों रुपये के कारोबार का मालिक

MDH मसालों के विज्ञापनों से घर-घर में पहचान बना चुके इसके मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्म भूषण से सम्मानित किया.

एमडीएच (MDH) मसाले का पूरा नाम महाशियां दी हट्टी है.

उनके पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी 1947 में देश के बंटवारे के बाद वे दिल्ली चले आए और यहीं बस गए। इसके बाद 1959 में एमडीएच मसाला फैक्टी, जिसे महाशियन दी हट्टी भी कहा जाता है, की स्थापना धर्मपाल गुलाटी ने 1959 में दिल्ली के कीर्ति नगर में की थी। आज इस मसाले का नाम देश ही नहीं, पूरी दुनिया में है।

भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद उनके परिवार के सामने मुसीबत खड़ी हो गई। पाकिस्तान से लोग पयालन करने गले। उनका परिवार भी इससे अछूता नहीं रहा। वालस्ट्रीट को दिए एक पुराने इंटरव्यू के अनुसार, धार्मिक हिंसा शुरू होने के बाद उनका परिवार 7 सितंबर 1947 को अमृतसर चला आया और यहां शरणार्थी शिविर में रहने लगा। इस समय धर्मपाल गुलाटी की उम्र 23 साल थी।

सिर्फ 5वीं पास हैं धर्मपाल

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अपने अलहदा मसालों के जरिये हर घर में पहचाने जाने वाले धर्मपाल सिर्फ 5वीं पास हैं। बताते हैं कि धर्मपाल का मन पढाई-लिखाई में बचपन से ही नहीं लगता था, जबकि उनके पिता चुन्नीलाल चाहते थे कि वह खूब पढ़ें। हालांकि, पिता की चाहत पूरी नहीं हुई और 5वीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था फिर पिता के साथ दुकान पर बैठने लगे थे।

काम की तलाश में दिल्ली पहुंचे गुलाटी

गुलाटी ने एक इंटरव्यू में कहा था, “अमृतसर दंगा प्रभावित इलाके के पास था। इस वजह से मैं दिल्ली चला आया। पिताजी ने आते वक्त 1500 रुपये दिए थे। यहां बिना पानी, बिजली और शौचालय वाला एक फ्लैट लिया और तांगा चलाने लगे।”

यहां से वे काम की तलाश में दिल्ली चले आए। उन्होंने 650 रुपए में एक तांगा खरीदा और चलाने लगे. वह दो आना प्रति सवारी लेते थे. उन्होंने ने कई बार अपने तांगे पर गांधीजी को बिठाकर शहर घुमाया है.

तांगा बेचकर शुरू किया मसालों का व्यापार

कुछ समय तक तांगा चलाने के बाद धर्मपाल गुलाटी ने एक बार फिर से अपने पैतृक व्यवसाय की ओर रुख किया। अजमल खान रोड पर मसालों की एक छोटी सी दुकान खोल ली। दुकान अच्छी चलने लगी।10 अक्टूबर 1948 में धर्मपाल ने अपना तांगा और घोड़ा बेच दिया. उसके बाद उन्होंने एक खोखा खरीदा और उसमें अपना मसालों का बिजनेस देगी मिर्च वालों के नाम से फिर से शुरु किया.सियालकोट की एक बड़ी दुकान से उठ कर धर्मपाल का पूरा परिवार एक छोटे से खोखे में आ पहुंचा.

इसलिए MDH कंपनी के मालिक की उम्र इतनी ज्यादा है और इसे भारतीय खाद्य उद्योग में कामयाबी की एक बड़ी मिसाल माना जाता है. लेकिन इस कंपनी को इस मुकाम तक पहुंचाने वाले 95 वर्षीय धर्मपाल गुलाटी का सफर आसान नहीं था.

बढ़ई बनाना चाहते थे पिता, बन गए मसाला किंग

धर्मपाल गुलाटी के पिता चुन्नी लाल ने उन्हें एक बढ़ई की दुकान पर काम सीखने के लिए लगा दिया, लेकिन धर्मपाल का मन नही लगा और उन्होंने वह काम भी नही सीखा। इस पर पिता ने धर्मपाल के लिए एक मसाले की दुकान खुलवा दी।

1959 में शुरू की अपनी फैक्ट्री

धर्मपाल गुलाटी ने 1953 में चांदनी चौक में एक और दुकान किराए पर ली। इसके बाद जब कारोबार बढ़ने लगा तो 1959 में कीर्ति नगर में एक प्लॉट खरीद फैक्ट्री शुरू कर दी। आज एमडीएच पूरी दुनिया में मशहूर है।

खुद पीसते थे मसाले

महाशय धर्मपाल के परिवार ने छोटी सी पूंजी से कारोबार शुरू किया था लेकिन, कारोबार में बरकत के चलते वह दिल्ली के अलग–अलग इलाकों में दुकान दर दुकान खरीदते चले गए. मिर्च-मसालों की बिक्री जब ज्यादा होने लगी तो उनकी पिसाई का काम घर के बजाए अब पहाड़गंज की मसाला चक्की में होने लगा था. सियालकोट के दिनों से ही मसालों की शुद्धता गुलाटी परिवार के धंधे की बुनियाद थी. यही वजह थी कि धर्मपाल ने मसाले खुद ही पीसने का फैसला कर लिया. लेकिन ये काम इतना आसान नहीं था. वो भी उन दिनों में जब बैंक से कर्ज लेने का रिवाज नहीं था. लेकिन महाशय धर्मपाल की ये मुश्किल ही उनकी कामयाबी की वजह बन गई.

आज है अरबों रुपये का कारोबार

धर्मपाल मसालों की दुनिया में आज बेमिसाल हैं. उनकी कंपनी सालाना अरबों रुपयों का कारोबार करती है. लेकिन एक तांगे वाले से अरबपति बनने की उनकी ये अदभुत कामयाबी 60 सालों की कड़ी मेहनत और लगन का नतीजा है. दौलत के ढेर पर बैठ कर आज भी महाशय धर्मपाल ईमानदारी, मेहनत और अनुशासन का पुराना पाठ भूले नहीं है. यही वजह है कि आज उनके मसाले दुनिया के सौ से ज्यादा देशों में इस्तेमाल किए जाते हैं और इसके लिए उन्होंने देश और विदेश में मसाला फैक्ट्रियों का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा कर दिया है.

दुबई में फैक्ट्री, लंदन, शारजाह, यूएस में ऑफिस है. MDH के पूरी दुनिया में डिस्ट्रिब्यूटर हैं. इसके अलावा गल्फ देशों में भी आपको एमडीएच के मसाले मिलेंगे. ऑस्ट्रेलिया चले जाएं, साउथ अफ्रीका चले जाएं, न्यूजीलैंड चले जाएं, हांगकांग, सिंगापुर यहां तक चीन और जापान में भी MDH है. 40 सुपर स्टॉक हैं पूरे इंडिया में और 1000 डिस्ट्रिब्यूटर हैं. हर महीने छह लाख आउटलेटस को केटर करते हैं.

वित्तिय वर्ष 2016-17 के दौरान 21 करोड़ कमाई

पांचवी पास गुलाटी ने पिछले वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान 21 करोड़ रुपये की कमाई की थी, जो गोदरेज कंज्यूमर के आदि गोदरेज और विवेक गंभीर, हिंदुस्तान यूनिलीवर के संजीव मेहता और आईटीसी के वाई सी देवेश्वर की कमाई से भी कहीं ज्यादा थी।

पद्म भूषण से नवाजा है

देश की नामी मसाला कंपनी महाशया दी हट्टी (MDH) के प्रमुख व्यवसायी 95 वर्षीय धर्मपाल गुलाटी फिर चर्चा में हैं। दरअसल, शनिवार को राष्ट्रपति भवन में महामहिम रामनाथ कोविंद ने एमडीएच (MDH) मसालों के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी को पद्म भूषण से नवाजा है।

धर्मपाल गुलाटी को व्यापार और प्रसंस्करण के क्षेत्र में बेहतर योगदान के लिए पद्म भूषण अवॉर्ड दिया गया है। धर्मपाल के नेतृत्व में एमडीएच मसालों का नाम न केवल पूरे देश में,बल्कि पूरी दुनियाभर में मशहूर है। ये कंपनी 60 से भी अधिक तरह के मसाले तैयार करती है और उसका दुनिया के कई देशों में निर्यात करती है।

93 साल के लंबे सफर के बाद सियालकोट की महाशियां दी हट्टी आज दुनिया भर में एमडीएच के रूप में मसालों का ब्रांड बन चुकी है. देश को उन पर गर्व है।