हम सही मायने में अपनी असली जिंदगी कितना जीते हैं

हम केवल आधी ही जिंदगी अपने लिए जी पाते हैं बाकि की जिंदगी हम अनजान गुमराह और कर्ज की जीते हैं।

क्या आप जानते हो कि आप अपनी पूरी उम्र भर में अपनी सही जिंदगी कितना जीते हो शायद नहीं हम कभी नहीं सोचते कि जो जिंदगी हम जी रहे हैं वह क्या सही मायने और सही तरीके से अपने लिए जी रहे हैं आइए देखते हैं हम कब अपनी जिंदगी अपने लिए जी रहे हैं और कब दूसरों के लिए जी रहे हैं या सिर्फ अपनी उम्र पूरी कर रहे हैं उम्र काटना जिंदगी जीना नहीं होता क्योंकि उम्र का कोई भरोसा नहीं और जिंदगी हमारे अपने हाथ में है तो क्यों ना हम इसे अपने लिए अपने तरीके से जिए।

1.   जब बच्चा पैदा होता है तब से लेकर और उसकी पढ़ाई खत्म होने तक या जब तक वह खुद कमाने ना लग जाए या अपने पैरों पर खड़ा ना हो जाए तब तक वह अपनी जिंदगी जीता है अपने लिए जीता है।

2.  जिस दिन वह अपना पहला दिन अपने जॉब पर जाता है उस दिन से वह दूसरों के लिए जीना शुरू हो जाता है और यहीं से शुरू होती है हमारी उम्र कटने की दास्तान जहां से जिंदगी अलग रास्ते से भटक जाती है।

3.   उसके बाद आपकी शादी होती है आपके बच्चे होते फिर आप उनके लिए जीते हो फिर बच्चों के पढ़ाई बच्चों की शादी बच्चों की जॉब तब तक आप लगभग बूढ़े होने लगते हो और बच्चे भी आपसे दूर होने लगते हैं धीरे धीरे बीमारियां कमजोरी नजदीक आने लगती है अपनी बीमारियों अपने बुढ़ापे अपने बच्चों के मोह और यादों में जीते हो।

4.  उसके बाद बाकि की जिंदगी हम अपने अतीत में जीते हैं जिंदगी के उन पलों को याद करने में जीते हैं जिन्हे हमने यूँ ही गँवा दिया और अब सोचते हैं की काश अब वो दिन लौट कर आ जाएँ लेकिन बिता हुवा समय कभी लौट कर नहीं आता इसलिए जिंदगी को अपने लिए जियें।

5. जिंदगी को यूँ जीवो की इसके आखरी दिनों में आप को किसी चीज का गम न हो बल्कि अपनी पीछे की जिंदगी को याद कर आप सन्तुष्ट हों और जिंदगी के आखरी पलों में भी आपकी ख़ुशी बरक़रार रहे।

सैर कर दुनिया की गालिब जिंदगानी फिर कहां। जिन्दगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ।।

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