गणतंत्र के 71 साल : शख़्स जिसने लाहौर की दीवारों को रंग दिया था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ जानिए इनके बारे में

महात्मा गांधी के दर्शन ने तिलक राजकपूर को इस कदर प्रभावित किया कि वे कक्षा दस की पढ़ाई के दौरान ही आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। इन्हें लाहौर (तब भारत) की दीवारों पर ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ स्लोगन लिखने की जिम्मेदारी मिली थी, जिसे उन्होंने साथियों के साथ बखूबी निभाया।

सूर्योदय होते ही नारों से रंगी दीवारें देख अंग्रेज बौखला गए और सभी को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि नाबालिग होने की वजह से चार घंटे बाद उन्हें छोड़ दिया गया था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तिलक राजकपूर बताते हैं कि महत्मा गांधी लाहौर (तब भारत का हिस्सा) से गुजरने वाले थे।

इसकी जानकारी होने पर लोग उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े। मैं भी अपने पिता देवी दत्ता के साथ गया था। उन्हें देखने के बाद इतना प्रभावित हुआ कि देश सेवा का संकल्प ले लिया। पिता जी ने भी इस कार्य में लगने का विरोध नहीं किया। मुझे चार-पांच अन्य बच्चों के साथ दीवारों पर अंग्रेजों भारत छोड़ो लिखने की जिम्मेदारी दी गई।

मैंने साथियों के साथ रात भर में कई दीवारों पर इस स्लोगन को लिख दिया। सूर्योदय होने पर जब अंग्रेजों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने सभी को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि नाबालिग होने के कारण चार घंटे बाद चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

उन्होंने बताया कि इसके बाद सत्याग्रहियों को पानी पिलाने के लिए लगाया गया। उस समय फिरंगी सेना सत्याग्रहियों को पानी तक देने नहीं देती थी, मगर हम लोग चोरी से उनकी सेवा करते थे। देश आजाद होने के बाद हुए विभाजन में पिता जी के साथ मैं भी वाराणसी आ गया। तिलक को 18 वर्ष तक नि:शुल्क नागरिक सुरक्षा के लिए 1981 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला।